- शिमला. जीवन िकतना भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हो यदि लक्ष्य सही हो तो वहां तक पहुंचने में भले ही अड़चनें आए लेकिन सफलता िमल ही जाती है। इसी सूत्र वाक्य से प्रभािवत होकर लेखक ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर एक पुस्तक प्रकािशत की है। ‘अरविंद केजरीवाल – जिद से जीत तक’ नाम से प्रकािशत पुस्तक संदीप उपाध्याय की दूसरी पुस्तक है। पुस्तक के नाम से अंदर की सामग्री का मजलूम भांपा जा सकता है। संदीप भले ही अरविंद के साथ न रहे हों लेकिन उसके बारे में जो कुछ सुना, पढ़ा, देखा उसे गंभीरता से महसूस किया। इसे लेखक की बड़ी उपलब्धता में गिना जा सकता है। अरविंद केजरीवाल के बचपन से लेकर मुख्यमंत्री बनने तक की हर घटना, वाकया और प्रकरण को लेखक ने बड़ी बारीकी से किताब में उतारा है। लेखक ने बड़ी सरल भाषा में उनकी जीवनी को िलखा है जो हर किसी पाठक के मन में सीधा असर कर जाएगा ऐसा विश्वास किया जा सकता है। िकताब में केजरीवाल के जीवन में आ रहे उतार चढ़ाव अौर हर पड़ाव में उन्हें किन-किन चुनौितयों और संघर्ष का सामना करना पड़ा का उल्लेख किया है। पुस्तक में केजरीवाल के बचपन की पढ़ाई से लेकर, इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा हो या आईआरएस में चयन होने की बात या फिर राजनीित में प्रवेश लेकर मंजिल तक पहुंचने की बात को बड़ी साधारण भाषा में पाठक तक पहुंचाया है। अरविंद केजरीवाल के साथ शुरू से जुड़े किन-किन साथियों ने साथ दिया और कौन-कौन उन्हें मझधार में छोड़कर चले गए का उल्लेख भी पुस्तक में मिलता है। लेखक ने पत्रकारिता के साथ-साथ पुस्तक के लिए उपयोग में लायी सामग्री का जिस जिज्ञासा और कर्मठता से संग्रहण किया है वह सराहनीय ही नहीं बल्कि उल्लेखनीय है। उसके अरविंद के जीवन का एक एक पन्ना पाठक के सामने आता रहता है और उपन्यास की तर्ज पर लिखी यह पुस्तक जब पाठक शुरू करता है और जब तक पूरी न पढ़ ले पुस्तक नहीं छोड़ता।
- लेखक स्वयं कहते हैं कि गांधीवादी विचारधारा से प्रभािवत अरविंद केजरीवाल के मन में देश सेवा का जज्बा भरा है। यह जज्बा उनको आयकर विभाग में असिस्टेंट कमिश्नर की नौकरी छोड़ने का साहस देता है और आंदोलन के रास्ते राजनीित में उतर पड़ते हैं। अरविंद की जिद ही उन्हें उनके मुकाम तक पहुंचाती है। अरविंद केजरीवाल सरकारी तंत्र में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ अांदोलन पर उतरते हैं। वह यह भी मसहूस करते हैं कि आज देश का युवा इस संक्रमण के दौर में सरकारी तंत्र की उदासीनता, िरश्वतखोरी और भाई भतीजावाद से तंग है। इसी विश्वास के साथ वे आंदोलन पर उतरे और िनम्न वर्ग से लेकर उच्च वर्ग से सभी उम्र के लोग उनके साथ जुड़ते गए। लेखक ने पुस्तक में क्रम से उनकी जीवनी को किताब में लिखा है। अन्ना हजारे के अांदोलन में अरविंद की भूिमका और उनका लक्ष्य को बड़े खूबसूरत ढंग से पाठकों तक पहुंचाया है। लेखक की एक बड़ी खासियत यह भी नजर आती है कि उन्होंने अरविंद के जीवन में आए अनेक अवसरों, घटनाओं और चित्र सहित किताब में प्रकािशत िकए हैं। इन चित्रों को एकत्र करने में उन्होंने काफी मेहनत की है। लगभग ढाई सौ पृष्ठों की यह पुस्तक तक्षशिला प्रकाशन दिल्ली ने प्रकािशत की है। हार्डबोंड पुस्तक की कीमत 595 रुपए है। लेखककी दूसरी पुस्तक प्रकािशत होने और अच्छे विषयवस्तु पर पुस्तक िलखने के िलए लेखक को बधाई तो बनती है।
- पुस्तक का कवर संलग्न है।
जिंदगी के साल कम होते जा रहे हैं और हम हैं कि अपने में ही खोते जा रहे हैं। कब, किस मोड़ पर किसकी मदद लेना पड़ जाए,यह हकीकत भी हमारी समझ में न आए। प्रेम के दो मीठे बोल, धन्यवाद का एक शब्द बोलने में हमारी जेब का एक धेला खर्च नहीं होता लेकिन हम यहां भी कंजूस बने रहते हैं, जैसे शब्दों को ज्वैलर्स की दुकान से तोले के भाव खरीद कर लाए हों। हां जब किसी की आलोचना करने का अवसर हाथ लग जाए तो इन्हीं शब्दों को पानी की फिजूलखर्ची की तरह बहाते रहते हैं। जाने क्यों मुझे बैंक संबंधी कामकाज बेहद तनाव भरा एवं चुनौतीपूर्ण लगता है। शायद यही कारण है कि जब किसी नई बैंक में काम पड़ता है तो मैं इस सकारात्मक विचार के साथ बैंक में प्रवेश करता हूं कि कोई मददगार जरूर मिल जाएगा। माल रोड स्थित पीएनबी की शाखा में एकाउंट खुलवाने के लिए गया तो वहां पदस्थ मुकेश भटनागर मेरे लिए खुदाई खिदमतगार ही साबित हुए। कोई आपके लिए मददगार साबित हो तो क्या वह धन्यवाद का भी पात्र नहीं होता। मुझसे यह भूल हुई, लेकिन कुछ पल बाद ही मैंने सुधार कर लिया। तनख्वाह के बदले सेवा देना किसी भी शासकीय, अशासकीय कर्मचारी का काम है। काम के बदले में ...

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