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अरविंद जिद से जीत तक

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अरविंद जिद से जीत तक

केजरीवाल की सफलता का पाठ पढ़ाती पुस्तक

ब्रह्मानंद देवरानी

कठपुतली की डोर उस ओर

राजनीति में भी जो फिट है वही हिट है फॉर्मूला चलता है। नई आरक्षण नीति ने कई पुराने दिग्गजों को जमीन दिखा दी। फिर भी सत्ता में रहने के लिए तुर्रमखोरों ने तोड़ निकाल ही लिया। भले ही वे प्रधान न बन पाए हों लेकिन पंच, उपप्रधान, बीडीसी या जिला परिषद में तो पहुंच ही गए। पंचायतों में पंचों से लेकर सरपंचों तक की ताजपोशी हो गई। आरक्षण को लेकर सरकार मान बैठी है कि महिलाओं, दलितों और पिछड़ों का भला हो गया। पंचायतों में अब नए चेहरों की भरमार है। वही गांवों की संसद चलना वाले हैं। लेकिन वे तो कठपुतली भर हैं। असली डोर तो अभी भी पुराने पंचों और सरपंचों के ही हाथ में ही है। पंचायती राज चुनावी की पूरी प्रक्रिया में उन्होंने अपनी उपस्थिति का एहसास करवाया। वार्ड पंचों के लिए उम्मीदवारों से लेकर प्रधान, उपप्रधान के प्रत्याशियों के चयन को लेकर उन्होंने ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मतदाताओं को रिझाने के लिए नुस्खे भी उनके ही चले। वोटर की हर मर्ज की दवा उनके पास ही मिली। अब चूंकि अधिकतर नए प्रत्याशी अखाड़े में थे, इसलिए उन्हें पुराने दिग्गजों के आशीर्वाद और उनके अनुभवों की दरकार थी। कई को मजबूरी में ही सही प...

जेब से तो कुछ नहीं जा रहा फिर इतनी कंजूसी क्यों

जिंदगी के साल कम होते जा रहे हैं और हम हैं कि अपने में ही खोते जा रहे हैं। कब, किस मोड़ पर किसकी मदद लेना पड़ जाए,यह हकीकत भी हमारी समझ में न आए। प्रेम के दो मीठे बोल, धन्यवाद का एक शब्द बोलने में हमारी जेब का एक धेला खर्च नहीं होता लेकिन हम यहां भी कंजूस बने रहते हैं, जैसे शब्दों को ज्वैलर्स की दुकान से तोले के भाव खरीद कर लाए हों। हां जब किसी की आलोचना करने का अवसर हाथ लग जाए तो इन्हीं शब्दों को पानी की फिजूलखर्ची की तरह बहाते रहते हैं। जाने क्यों मुझे बैंक संबंधी कामकाज बेहद तनाव भरा एवं चुनौतीपूर्ण लगता है। शायद यही कारण है कि जब किसी नई बैंक में काम पड़ता है तो मैं इस सकारात्मक विचार के साथ बैंक में प्रवेश करता हूं कि कोई मददगार जरूर मिल जाएगा। माल रोड स्थित पीएनबी की शाखा में एकाउंट खुलवाने के लिए गया तो वहां पदस्थ मुकेश भटनागर मेरे लिए खुदाई खिदमतगार ही साबित हुए। कोई आपके लिए मददगार साबित हो तो क्या वह धन्यवाद का भी पात्र नहीं होता। मुझसे यह भूल हुई, लेकिन कुछ पल बाद ही मैंने सुधार कर लिया। तनख्वाह के बदले सेवा देना किसी भी शासकीय, अशासकीय कर्मचारी का काम है। काम के बदले में ...