राजनीति में भी जो फिट है वही हिट है फॉर्मूला चलता है। नई आरक्षण नीति ने कई पुराने दिग्गजों को जमीन दिखा दी। फिर भी सत्ता में रहने के लिए तुर्रमखोरों ने तोड़ निकाल ही लिया। भले ही वे प्रधान न बन पाए हों लेकिन पंच, उपप्रधान, बीडीसी या जिला परिषद में तो पहुंच ही गए।
पंचायतों में पंचों से लेकर सरपंचों तक की ताजपोशी हो गई। आरक्षण को लेकर सरकार मान बैठी है कि महिलाओं, दलितों और पिछड़ों का भला हो गया। पंचायतों में अब नए चेहरों की भरमार है। वही गांवों की संसद चलना वाले हैं। लेकिन वे तो कठपुतली भर हैं। असली डोर तो अभी भी पुराने पंचों और सरपंचों के ही हाथ में ही है। पंचायती राज चुनावी की पूरी प्रक्रिया में उन्होंने अपनी उपस्थिति का एहसास करवाया। वार्ड पंचों के लिए उम्मीदवारों से लेकर प्रधान, उपप्रधान के प्रत्याशियों के चयन को लेकर उन्होंने ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मतदाताओं को रिझाने के लिए नुस्खे भी उनके ही चले। वोटर की हर मर्ज की दवा उनके पास ही मिली। अब चूंकि अधिकतर नए प्रत्याशी अखाड़े में थे, इसलिए उन्हें पुराने दिग्गजों के आशीर्वाद और उनके अनुभवों की दरकार थी। कई को मजबूरी में ही सही पुरानों के पैर छूने पड़े। घर-घर जाकर वोट मांगने के साथ-साथ बैठकों में मंथन भी उन्हीं की अगुवाई में हुआ। उनकी बातों को सबसे ज्यादा तरजीह मिली। और तो छोडि़ए जीतने के बाद धाम में किसे निमंत्रण देना है और किसे नहीं ये भी कई जगह उन्होंने ही तय किया।
गोटी फिर फिट बिठा ली
कई चौधरियों ने तो सत्ता में रहने के लिए नुस्खे भी तलाश लिए। आरक्षण के बावजूद किसी न किसी सीट पर चुनाव लड़ ही लिया। पंच से लेकर सरपंच तक कहीं न कहीं अपनी गोटी फिर फिट बिठा ली। पंचायतों में पहुंची महिलाओं में अधिकतर संख्या भी उन महिलाओं की है जिनके पति पहले से पंचायतों में सक्रिय रूप से राजनीति करते आ रहे हैं। अधिकतर पंचायतों में उन्हीं की पसंद के लोग पहुंचे हैं। पंचायत में अब भी उनका उतना ही हस्तक्षेप रहेगा जितना पहला रहता था। नए चुने गए प्रतिनिधियों की अनुभवहीनता के चलते पंचायतों की नीतियां और योजनाएं उन्हीं के परामर्श के बाद बनने वाली हैं। गांव, वार्ड और परिवार को कितना धन बांटा जाना है पर्दे के पीछे वे ही ये सब तय करेंगे। पंचायतों में अभी भी उनकी बात सबसे ऊंची रहने वाली है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें